Description
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भारतीय संस्कृति एक ऐसी महान् संस्कृति है, जिसका दुनिया में कोई सानी है ही नहीं। हमारे वेद-उपनिषद् और भगवद्गीता ने मनुष्य को जन्म के साथ ही मृत्यु तक जो जीवन जीना है, उन सब चीजों के लिए अलग-अलग उपाय दिए हुए हैं। इस पुस्तक के माध्यम से हमने एक प्रामाणिक प्रयत्न किया है कि आज की जो सामान्य या अहम समस्या है, पति-पत्नी के संबंध और माँ-बाप का पुत्र-पुत्री के साथ व्यवहार, जिसे हम संस्कारों की मूलभूत बात भी कह सकते हैं, उसको वेद-उपनिषद् की ही बातों को थोड़ा सरल करके सामान्य व्यक्ति समझ सके और उसका उपयोग करके अपने घर को ‘धन्यो गृहस्थाश्रम’ कर सके। इस पुस्तक का नाम ‘नचिकेत’ इसलिए रखा गया है, क्योंकि हमारे वेद और उपनिषद् में नचिकेत पात्र को कई जगहों पर अंकित किया गया है, जो पात्र एक अद्भुत दैवी संतान की प्रतिकृति है, जिसको पढ़कर भी हमें ऐसा लगता है कि भगवान् हमारे घर पर ऐसी संतान को जन्म देना। ‘नचिकेत’ एक रूपक है—अद्भुत, अविस्मरणीय और असामान्य बालक का।
THE AUTHOR

संजय राय ‘शेरपुरिया’ ने अपने जीवन के 30 महत्त्वपूर्ण साल एक बड़े उद्यमी बनने के अपने सपने को साकार करने में बिताए, आज वह एक सामाजिक उद्यमी बनकर समाज के सामने खड़े है। वैसे तो उनका सामाजिक कार्यों को करने का इतिहास 2001 के गुजरात में आए भयावह भूकंप से ही शुरू हो गया था और धीरे-धीरे ‘जीवन-प्रभात’ से लेकर अनगिनत मानवीय कार्यों में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। अपने जन्मस्थान गाजीपुर जिले में पिछले साल से उनकी ‘मेरा रोजगार’ एवं ‘आत्मनिर्भर भारतीय’ की यात्रा शुरू हुई, जहाँ पर किसानों को अद्यतन तकनीक के माध्यम से उनकी आय को दुगुना करने का कार्य संपन्न हो रहा है। कोरोना की दूसरी लहर में सरकारी अस्पतालों में हो रही ऑक्सीजन की कमी को दूर कर ‘ऑक्सीजन मैन’ और श्मशान में हो रही लकडि़यों की कमी को ‘लकड़ी बैंक’ बनाकर पूरा किया तथा ‘लकड़ी मैन’ का सम्मान पाया। ‘हर साँस की आस’ बनकर गाजीपुर जिले में सेवा के कार्य किए। वह संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (एस.डी.जी. चौपाल) के ‘नेशनल ब्रांड एंबेसेडर’ हैं।
सिर्फ कार्यों से या समृद्धता के धनी न बनकर, संजय राय ‘शेरपुरिया’ विचारों से भी समृद्ध बने। निरंतर अभ्यास और जिज्ञासा के साथ उनको पुस्तक-लेखन की भी रुचि रही है। उन्होंने अब तक ‘कराहता बंगाल’, ‘जल प्रबंधन’, ‘टीचर्स’, ‘मैं माधो भाई ः एक पाकिस्तानी हिंदू’ जैसी कई पुस्तकों का लेखन किया और हर रविवार को ‘दैनिक भास्कर’ में मानवीय गुणों पर निरंतर लेख लिखकर एक अच्छे लेखक का भी सम्मान पाया





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