Description
यशस्वी रचनाकार स्व. गुरुदत्त ने रसायन विज्ञान (कैमिस्ट्री) में एम.एस-सी. करने के पश्चात् आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया, साथ-ही-साथ भारतीय आर्षषष ग्रंथों का गहन अध्ययन किया।
उन्होंने अपने पाठकों को अपने उपन्यासों के पात्रों के माध्यम से इन ग्रंथों का ज्ञान अत्यंत रुचिकर ढंग से दिया। प्रस्तुत उपन्यास ‘पाप और पुण्य’ की पात्र श्रीमद्भगवद्गीता के संदर्भ से पाप और पुण्य को परिभाषित करती है। वह समझाती है कि कुछ कार्य पाप नहीं होते, परंतु कानून की दृष्टि में अपराध होते हैं । इसी प्रकार कई कार्य कानून की दृष्टि में अपराध न होते हुए भी पाप होते हैं। ऐसा क्यों है ? यही इस उपन्यास का विषय है।
रोचकता से भरपूर कथा वर्तमान कानून व्यवस्था पर करारी चोट करती है। लेखक अपने इस पठनीय उपन्यास के पात्रों के माध्यम से हमें उस राह पर चलने का परामर्श देते हैं, जो न पापमय हों और न ही वर्तमान कानून की दृष्टि में अपराध हों। उपन्यास की तेज गति पाठक को बाँधकर रखती है और वह इसे आरंभ कर समाप्त किए बिना नहीं छोड़ सकता ।



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