Description
यह सच है कि इस सामाजिक यथार्थ से प्रारम्भिक दौर की छायावादी कविता तालमेल नहीं रखती है। रचना और आलोचना का प्राथमिक सरोकार मानव जीवन और समय से होता है। लेकिन काव्य-भाषा के रूप में खड़ीबोली को समृद्ध करना तत्कालीन चुनौती रही थी, जिसे नजरअन्दाज नहीं कर सकते थे। जहाँ जीवन की समग्रता का सवाल उठता है, वहाँ भी प्राथमिकता पर ध्यान देना होगा। अपने समय और समाज से छायावादी कवि पलायन नहीं करना चाहते थे इसलिए वे जल्दी समय की माँग की पहचान करने लगे, और धीरे-धीरे नवजागरण और स्वतंत्रता आन्दोलन पर ही नहीं बल्कि मानव-जीवन और सम्पूर्ण विश्व-प्रकृति पर मारक आघात करनेवाली आधुनिक सभ्यता तथा प्रभुवर्ग के सत्तामोह पर भी अपना ध्यान केन्द्रित करने लगे। इस तरह छायावादी कवि अपने ही इतिहास तथा परम्परा से सांस्कृतिक एवं नैतिक बल प्रदान करते रहें जिससे समाज आत्मसम्मान से भर उठे। छायावाद का प्रकृति चित्रण कहीं-कहीं आधुनिक पारिस्थितिक विमर्श की भी नींव डाल रहा था।




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