Description
“संस्कृत सुभाषित कोश’ में संस्कृत वाड्मय के अगाध सिंधु के मणि-माणिक्य हैं । मनीषियों ने अगाध सिंधु का अनंत वर्षों तक अवगाहन करके अमृत रूपी सुभाषित मानव जाति के सकल अभ्युदय हेतु संचित किए हैं। अनेक दोषों से दूषित, कलुषों से कलुषित, अनाचरणीय आचरणों के पाप-तमस से आच्छादित, अविद्यादि दुरितों से ग्रस्त-त्रस्त मानवता पर छाई मूर्च्छा का हरण करने में ये सुभाषित संजीवनी का कार्य करेंगे। ‘सा प्रथमा संस्कृति: विश्ववारा’ यजुर्वेद संहिता 7/14 जीवन जीने की उत्कृष्टतम पद्धति का नाम ‘संस्कृति’ है, जिसका सर्वविध विकास भारतवर्ष की पुण्यधरा पर हुआ। इस धरा के निवासी मानव के मन और बुद्धि ने कितनी ऊँचाइयों का स्पर्श किया, इन सुभाषितों में निहित संस्कृति से स्पष्ट है।
पुस्तकस्थ सुभाषित प्रेरणा, उत्साह, प्रसन्नता का संचार करने के साथ ही जिज्ञासा के नवीन स्रोतों का सृजन करेंगे। मानव को सहज, सरल, शांत और विवेकशील, विचारप्रपन्न बनाने में दिशा-बोधक का कार्य करते हुए उसमें सुप्त, कुंठित संवेदना को जाग्रत् कर उदात्त मानवीय गुणों से सरस संपन्न बनाने में इन सुभाषितों की विवेचनीय भूमिका होगी।”


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