Description
अपने सामने
कुंवर नारायण का यह कविता-संग्रह एक लम्बे समय कें बाद आ रहा है। ‘आत्मजयी’ के बाद की ये कविताएँ रचनाकाल की दृष्टि से किसी एक ही समय की नहीं हैं; इसलिए एक तरह की भी नहीं हैं। विविधता वैसे भी उनकी विशिष्टता है क्योंकि जीवन को अनुभूति और चिन्तन के विभिन्न धरातलों पर ग्रहण करने वाले कवि कुंवर नारायण अपनी कविताओं में सीमाएँ नहीं बनाते; उनकी ज्यादातर कविताएँ किसी एक ही तरह की भाषा या विषय में विसर्जित-सी हो गयी नहीं लगतीं – दोनो को विस्तृत करती लगती हैं। अनेक कविताएँ मानो समाप्त नहीं होती, एक खास तरह हमारी बेचैनियों का हिस्सा बन जाती हैं।
इस तरह से देखें तो वे अपने को सिद्ध करनेवाले कवि हमें नहीं नजर आते। वे बराबर अपनी कविताओं में मुहावरों से बचते हैं और अपने ढंग से उनसे लड़ते भी हैं। उनकी कविता की भाषा में धोखे नहीं हैं। अधिकांश कविताओं का पैनापन ज़िन्दगी के कई हिस्सों को बिल्कुल नये ढंग से छूता है।






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