Description
प्रत्येक भौगोलिक क्षेत्र में निवासरत समाज की अपनी एक विशिष्ट पहचान होती है। शताब्दियों से भारत में विभिन्न नृजाति समूह विश्व के विभिन्न क्षेत्रों से आते रहे हैं और एक-दूसरे से मिलकर भारतीय सामाजिक संरचना का निर्माण करते रहे हैं और आज वे भारतीय समाज का अभिन्न अंग बन गये हैं। इसी प्रक्रिया में भारतीय परिवेश में विचित्र विरोधाभास भी पैदा हुए हैं। समाज में मान्यताओं, विश्वासों और सांस्कृतिक विभिन्नताओं के बावजूद भी कई सूत्र ऐसे हैं जिन्होंने हमारे समाज को एकता के सूत्र में पिरोया है। भारत और भारतीय समाज की छवियों के परिप्रेक्ष्य समय और काल के अनुसार बदलते रहे हैं। भारतीय समाज से जुड़े कुछ प्रश्न सदैव विचारणीय रहे हैं कि भारतीय सामाजिक संरचना के मूलतत्त्व क्या हैं? इन तत्त्वों को कैसे समझा जाए? भारत जैसा विविधता वाला समाज कैसे एकता के सूत्र में बंधा हुआ है? आदि। इसी तरह सामाजिक संस्थाएँ वे तंत्र हैं, जो समाज की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाते हैं। समाज द्वारा मान्यता प्राप्त परिवार, विवाह, नातेदारी जैसी ये संस्थाएँ उन नियमों से संयोजित हैं जो जीवन को सुचारू रूप से चलाने में मदद करती हैं। इन व्यवस्थाओं के अपने नियम, स्वरूप, प्रकृति, कार्य क्या हैं? ये प्रश्न भी मस्तिष्क में लगातार उभरते रहते हैं। भारतीय समाज को गहराई से समझने के लिए इसके ग्रामीण तथा नगरीय क्षेत्रों के सन्दर्भों को समझना भी जरूरी है। यह संकलन भारतीय समाज से जुड़े इन्हीं विविध पहलुओं पर रोशनी डालता है। तीन खंडों में विभक्त इस संकलन के कुल 18 उत्कृष्ट अध्याय पाठकों और विद्यार्थियों को भारतीय समाज के बारे में अंतर्दृष्टि प्रदान करेंगे।






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