Description
लीलाधर मंडलोई का जीवन और चिन्तन अब उस मोड़ पर आ पहुँचा है जहाँ वे ‘आख़िरी समय’ और ‘अँधेरे में घर’ जैसी कविता लिख सकते हैं। मंडलोई ने अपने निजी जीवन और सफरिंग को केन्द्र में रखकर पहले भी दर्ज़नों कविताएँ लिखी हैं और इस संग्रह में भी ऐसी कई कविताएँ हैं जिनमें संकट के बदले हुए रूप को लक्षित किया जा सकता है। जीवन के संकट को समय के संकट से जोड़ देते हैं और उसकी ऐसी कविताओं में निजी अस्तित्व और सामाजिक अस्तित्व का भेद मिट जाता है। दूसरी तरफ़ सड़क बनाने वाले, इमारतें बनाने वाले और खेतों-खलिहानों में काम करने वाले वंचित जनों पर उनकी नज़र पहले की तरह ही बनी हुई है। वंचित (सबाल्टर्न) समाज से गहरे जुड़ाव के कारण ही वे देख पाते हैं कि ‘उनके कन्धों पर रखी कुदाल चमकती रहती है अँधेरों में’।






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