Description
मैंने ज़ाहिदा हिना के अफ़साने पढ़े और बेकल होकर सोचा कि ये बीबी अफ़साना
लिखती किस तरह से है। रफ़्ता-रफ़्ता (धीरे-धीरे) मालूम हुआ कि ये बीबी
अफ़साना लिखती नहीं, पूरती (बुनती) हैं। अफ़साने की शक्ल कुछ इस क़िस्म की
निकलती है जैसे मकड़ी ने जाला पूर दिया हो। ये तारीख़ (इतिहास) के पूरे
हुए जाल का अक्स (प्रतिबिम्ब/साया) है, इन अफ़सानों के किरदार (पात्र)
तारीख़ के जाले में फँसते हुए किरदार हैं और एक कर्ब (पीड़ा) से दो-चार
हैं। ये कर्ब (पीड़ा/दर्द) हिजरत के तज्रबे (मजबूरन देश त्यागने के अनुभव)
की देन है। सरसरे-बेअमाँ (असुरक्षा के झक्खड़) की मारी लड़की ने अगर हिजरत
न की होती तो उसके महसूसात (संवेदनात्मक अनुभव) भी वही होते जो कृशन चन्दर
के अफ़सानों में हस्सास (संवेदनशील) लड़कियों के हुआ करते थे। मगर हिजरत
के वाक़िए ने उनके महसूसात की सिम्त (दिशा) ही बदल दी है। एक हिजरत ने
कितनी ही हिजरतों की याद ताज़ा कर दी। ईरान से बैरुत, बैरुत से बग़दाद,
बग़दाद से बसरा, बसरा से सेहिन्द। ‘‘लेकिन ऐ वक़्त
तुझ से पनाह कहाँ है ? ऐ वक़्त ! हमारी हिजरतों का ख़ात्मा कब, कहाँ और
किस सरज़मीन में है ?






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