Description
विंध्याचल पर्वत मध्य रात्रि के निविड़ अंधकार में कालदेव की भांति खड़ा था. उस पर उगे हुए छोटे-छोटे वृक्ष इस प्रकार दृष्टिगोचर होते थे, मानो यह उसकी जटाएँ है और अष्टभुजा देवी का मंदिर जिसके कलस पर श्वेत पताकाएँ वायु की मंद-मंद तरंगों में लहरा रही थीं, उस देव का मस्तक है मंदिर में एक झिलमिलाता हुआ दीपक था, जिसे देखकर किसी धुंधले तारे का मान हो जाता था.





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