Description
आज से लगभग दो सौ साल पहले लिखा और खेला गया नाटक ‘इंदर सभा’ आधुनिक युग शुरू होने के आसपास लिखा गया दूसरा महत्वपूर्ण नाटक है। पहला नाटक वाजिद अली शाह द्वारा रचित ‘किस्सा राधा कन्हैया’ (1843) माना जाता है। ‘इंदर सभा’ ने ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया था जो सम्भवत: हिन्दुस्तानी में लिखे नाटकों के इतिहास में कोई दूसरा नाटक नहीं कर सका। इसके प्रभाव का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इसका अनुकरण करते हुए लगभग दो दर्जन नाटक और लिखे गए थे। यह नाटक न केवल एक अत्यंत लोकप्रिय नाटक था बल्कि भारतीय संस्कृति के उस स्वरूप का बेहतरीन उदाहरण भी है जिसे हम साझा संस्कृति का नाम देते हैं। नाटक में उस समय का समाज और लोगों की सांस्कृतिक अभिरुचियों का भी दर्शन होता है। लोक चेतना के साथ-साथ फारसी काव्य परम्परा का सम्मिश्रण यह दर्शाता है कि इस युग में समन्वय और सहयोग की क्या स्थिति थी। फारसी और उर्दू के साथ-साथ खड़ी बोली के लोकगीतों की चाशनी एक अद्भुत प्रभाव उत्पन्न करती है।
मूल नाटक ओपेरा शैली में लिखा गया है लेकिन यह माना जाता है कि उसका प्रेरणा सूत्र ओपेरा शैली नहीं बल्कि रासलीला का बुनियादी ढाँचा था जिसमें संवादों से अधिक कविता का महत्त्व दिखाई पड़ता है। कविता और संगीत के प्रति उसे समय दर्शकों के अन्दर जितना उत्साह और लगन रही होगी इतनी शायद आज नहीं है। दूसरी बात यह है कि नाटक में नाटकीयता के तत्वों पर अधिक बल नहीं दिया गया है।
नाटक का पुनर्पाठ तैयार करते समय आज के रंगमंच और नाटक प्रेमियों को ध्यान में रखा गया है। इस प्रक्रिया में नाटक का आकार छोटा किया गया है और पात्रों के चरित्र चित्रण पर कुछ अधिक ध्यान दिया गया है। नाटकीयता को बढ़ाने की कोशिश की गई है। कुछ संवाद और कुछ पद जोड़े गए हैं लेकिन यह ध्यान रखा गया है की नाटक की मूल आत्मा बनी रहे। पुनर्पाठ निर्देशकों को कल्पनाशील बने रहने की बने रहने की सम्भावनाएँ भी प्रस्तुत करता है। इंदर सभा को आजादी के बाद कई निर्देशकों ने मंच पर अलग-अलग ढंग से प्रस्तुत किया है। यह इस बात का प्रमाण है की नाटक आज भी दर्शकों को आकर्षित करने की क्षमता रखता है। आशा है कि नाटक का पुनर्पाठ इस दिशा में एक सार्थक प्रयास माना जाएगा।


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