Description
औरतों, अल्पसंख्यकों और देश-दुनिया के दमित-उत्पीड़ितों के पक्ष में हमेशा अपनी आवाज़ बुलन्द रखनेवाली कथाकार नासिरा शर्मा ने अपने सरोकारों और चिन्ताओं को अपनी कहानियों, उपन्यासों, निबन्धों और साक्षात्कारों में लगातार स्वर दिया है।
यह उनके स्तम्भों का संकलन है जो उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर लिखे। स्त्री और उसकी सामाजिक-पारिवारिक स्थिति तो उनके चिन्तन में प्राथमिक रही ही है, पर्यावरण, साम्प्रदायिक सौहार्द, नए पुरुष और स्त्री के आपसी सम्बन्ध, पारिवारिक रिश्ते और हमारे आसपास का तेज़ी से बदलता हुआ परिवेश भी उनकी संवेदना के दायरे में रहा है।
इस पुस्तक में संकलित स्तम्भ-लेखन में उन्होंने सम-सामयिक घटनाओं के हवाले से अनेक उन समस्याओं पर अपनी क़लम चलाई है जो समाज और इनसान के वर्तमान और भविष्य से, उसकी नियति से गहरे जुड़े हैं।
उल्लेखनीय यह कि वे जो देखती हैं, जो लिखती हैं, उसमें अपनी स्त्री-दृष्टि को पहले रखती हैं। स्त्री, जिसका न सिर्फ़ दुनिया को देखने का तरीक़ा अलग है, बल्कि उसे बरतने और समझने का सलीका भी पुरुष के मुक़ाबले ज़्यादा मानवीय और करुणार्द्र है। इन आलेखों में उनकी यह विस्तृत और संवेदनशील दृष्टि साफ़ दिखाई देती है।






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