Description
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अगले ही पल सबका खून जम गया। एक भयंकर गर्जना हुई, जिसे सुनकर राजकुमार का घोड़ा अपनी अगली टाँगें हवा में उठाकर पीछे की ओर खिसका, अपने सवार को जमीन पर पटका और दूसरी दिशा में भाग गया। वह इतना साहसी नहीं था कि इतनी भयानक गर्जना वाले दानव के साथ युद्ध कर सके।
गंगाराम ने कनकपुर जाकर राजा से पूछने का निश्चय किया। यदि यह सच में वही पत्थर है, तो वह उसे लौटा देगा। गंगाराम किसी को दुःखी नहीं देख सकता था। यदि राजकुमारी को उसके दुःख से मुक्ति दिलाना उसके हाथ में था, तो वह ऐसा अवश्य करेगा।
रामदास झलसी के वन में लकड़ी काटने गया था। शेर-चीतों से बचने के लिए वह जान-बूझकर दिन के समय गया था। जब उसने किले के पास बारह फीट लंबे दो पैरों के एक जीव को देखा, तो वहाँ से भाग आया। उस जीव का शरीर रोओं से भरा था, हाथ-पैरों में नुकीले नाखून थे, मुँह के कोनों में तीखे दाँत थे, जैसे जानवरों के होते हैं, सुर्ख लाल आँखें थीं और उलझे हुए बाल थे।
—इसी पुस्तक से
महान् लेखक सत्यजित रे की ‘जादुई बाल कहानियाँ’, जिनमें छात्रों का सहज-सरल कौतूहल, रहस्य और रोमांच के प्रति आकर्षण और तीव्र उत्कंठा दिखाई देती हैं।
THE AUTHOR

भारत रत्न से सम्मानित फिल्म निर्देशक सत्यजित रे को 20वीं शताब्दी के सर्वोत्तम फिल्म निर्देशकों में गिना जाता है। इनका जन्म कलकत्ता के एक बंगाली परिवार में 21 मई, 1921 को हुआ। अपने कॅरियर की शुरुआत इन्होंने पेशेवर चित्रकार की तरह की। बाद में इनका रुझान फिल्म निर्देशन की ओर हुआ। अपने जीवन में 37 फिल्मों का निर्देशन किया, जिनमें फीचर फिल्में, वृत्तचित्र और लघु फिल्में शामिल हैं। इनकी पहली फिल्म ‘पथेर पांचाली’ को कान फिल्मोत्सव में मिले ‘सर्वोत्तम मानवीय प्रलेख’ पुरस्कार को मिलाकर कुल ग्यारह अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले। यह फिल्म ‘अपराजितो’ और ‘अपुर संसार’ के साथ इनकी प्रसिद्ध अपु त्रयी में शामिल है। रे फिल्म निर्माण से संबंधित अनेक काम खुद ही करते थे। फिल्में बनाने के अतिरिक्त वे कहानीकार, प्रकाशक, चित्रकार और फिल्म आलोचक भी थे। रे को जीवन में कई पुरस्कार मिले, जिनमें अकादमी पुरस्कार, फिल्मफेयर पुरस्कार, सर्वश्रेष्ठ निर्देशक पुरस्कार और सर्वश्रेष्ठ फिल्म समीक्षक शामिल हैं। स्मृतिशेष : 23 अप्रैल, 1992।




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