Description
परमाणु हथियारों की जरूरत किसे है, देशों और उनके नक़्शों को? वहाँ रहने वाले लोगों को, या उन लोगों के डरों को अपनी सत्ताकांक्षा की खुराक बनाने वाले राष्ट्राध्यक्षों को? या यह सिर्फ संसार के शक्ति-सन्तुलन की माँग है जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती? ‘रुई लपेटी आग’ के केन्द्र में मूलत: यही प्रश्न हैं जिन्हें उपन्यास अपनी विशिष्ट कथा-शैली में धीरे-धीरे जरूरी प्रश्नों के तौर पर स्थापित कर देता है। कथा का एक सिरा संगीत है और दूसरा पोखरण। वही पोखरण जहाँ 1974 और फिर 1998 में भारत ने अपने सफल परमाणु परीक्षण किए थे और जिनके चलते दुनिया के परमाणु शक्ति-सम्पन्न देशों की श्रेणी में सम्मानित जगह बना पाया था। दूसरी तरफ पखावज है जिसकी रचना, एक किंवदन्ती के अनुसार, शिव के तांडव को लयबद्ध करने के लिए ब्रह्मा ने की थी ताकि सृष्टि के विनाश को रोका जा सके। पखावज उस विनाश को रोक तो नहीं पाता लेकिन उससे पैदा हुए घावों को खुली आँखों से देखते हुए अपनी असहमति ज़रूर व्यक्त करता है। हिरोशिमा और नागासाकी को एक चेतावनी की तरह याद रखते हुए पखावज की साधिका अरुंधति पोखरण से मात्र चार किलोमीटर दूर स्थित खेतोलाई गाँव की भूमि को अपने कार्यक्रम के लिए चुनती है। पोखरण में हुए परमाणु विस्फोट के परिणामस्वरूप राजस्थान के इस गाँव में आज ऐसा कोई घर नहीं है जहाँ एक-दो लोग गम्भीर बीमारियों के शिकार नहीं हैं। उपन्यास में भारत की उस सहज जीवनशैली को बखूबी रेखांकित किया गया है जिसमें विभिन्न समुदायों की सहजीविता समाज के सहजबोध का हिस्सा है, और जो बीच-बीच में साम्प्रदायिक राजनीति का शिकार होते रहने के बावजूद अभी तक बची हुई है। लेकिन केंद्रीय प्रश्न परमाणु शक्ति की नैतिक वैधता का ही है, रुई में लिपटी रखी उस आग के औचित्य का जो कभी भी भड़क सकती है और पूरी मानव-जाति के विनाश का कारण बन सकती है।





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