Description
प्रभा खेतान का नाम कृष्णा सोबती, मन्नू भण्डारी और उषा प्रियंवदा के बाद की पीढ़ी की महत्त्वपूर्ण लेखिकाओं में लिया जाता है। लेखन और व्यवसाय दोनों को सफलतापूर्वक साधकर पितृसत्तावादी समाज में उन्होंने स्वयं को साबित किया है। उनकी अधिकांश रचनाओं में उनकी उपस्थिति उसी तरह झलकती है जैसे अपनी ही कहानी में लेखक ख़ुद दर्शक, सूत्रधार और चरित्र की भूमिका में दिखाई देता है। उनके सभी उपन्यासों में पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था के बीच स्वतन्त्रता और समानता के लिए संघर्षरत विभिन्न स्त्री चरित्र दिखाई देंगे। जहाँ एक ओर उन्होंने स्त्री जीवन की विविध समस्याओं को उठाया है वहीं दूसरी ओर स्त्री के इन समस्याओं से दो-चार होने वाली सामाजिक व्यवस्था की पड़ताल भी की है।
अपने-अपने चेहरे की प्रमुख स्त्री पात्र रमा विवाहित पुरुष राजेन्द्र गोयनका से प्रेम करती है। वह उनके परिवार को ख़ुश रखने का हर सम्भव प्रयास करती है। किन्तु फिर भी राजेन्द्र का परिवार उसे नहीं अपना पाता। समाज उस पर दूसरी औरत होने का लेबल चस्पाँ कर देता है। रमा दूसरी औरत के इस लेबल को हटाने का पूरा प्रयास करती है और अपना अलग अस्तित्व स्थापित करने के लिए दिन-रात परिश्रम करती है। पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री शोषित होती रही है- कभी रमा के रूप में, कभी मिसेज गोयनका के रूप में तो कभी रीतू के रूप में।
इस उपन्यास में लेखिका पुरुष की सहायिका से अलग स्त्री अस्तित्व के निर्माण की बात करती हैं। वे कहती हैं स्त्री का स्वयं का अस्तित्व उसकी अलग पहचान भी होनी चाहिए। उनके अनुसार स्त्री को न केवल अपने पैरों को मज़बूत करना होगा बल्कि जिस ज़मीन पर वह खड़ी है वह भी मज़बूत करनी होगी तभी वह पुरुषवादी सत्ता के सामने टिक सकेगी। स्वतन्त्रता केवल धनार्जन से प्राप्त नहीं होती उसके लिए स्त्री को स्वयं अपनी, परिवार की और समाज की सोच में परिवर्तन लाने की आवश्यकता है।



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