Description
इस कविता-संग्रह में वह दृष्टि है जो समय को झरती हुई पत्तियों की जगह फूटती हुई कोंपलों में देखने का हौसला रखती है। विनोद कुमार शुक्ल की कविताएँ शब्दों को ध्वजा की तरह फहरानेवाली कविताएँ नहीं हैं। अनुभवों को हमारे पास छोड़कर स्वयं अदृश्य हो जानेवाली या अपने अद्भुत वाक्य-विन्यास की मौलिकता से स्वयं का दर्ज़ा प्राप्त कर लेनेवाली भाषा इन कविताओं की विशेषता है।… मंगल ग्रह सूना है। पृथ्वी के पड़ोस में सन्नाटा है। संकट में पृथ्वी के लोग कहाँ जाएँगे, कहकर उनकी कविताएँ हमारी संवेदना को जिन महत्तम आयामों से जोड़ती हैं, वह समकालीन कविता के लिए अभूतपूर्व है। जिस भाषा को राजनीतिज्ञों ने झूठा और कवियों ने अर्थहीन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, उसी से विनोद कुमार शुक्ल सच्चाई और जीवन में शेष हो चली आस्था की पुनर्रचना कैसे कर लेते हैं, यह एक सुखद आश्चर्य का विषय है। इसमें बच्चे हैं मज़दूरनियों के, जो दूध से पहले माँ के स्तनों पर आए पसीने का स्वाद चखते हैं। उन्हीं के शब्दों में कहें तो यह कविता की दुर्लभ प्रजाति है जिसमें ऊबा हुआ पाठक ताज़गी से भरी कुछ गहरी साँसें ले सकता है।…इस पत्थर समय को मोम की तरह तराशते चले जाने की ताक़त और निस्संगता के स्रोत विनोद कुमार शुक्ल की ग़ैर-साहित्यिक पृष्ठभूमि और रुझानों में हैं। यह उनकी वैज्ञानिक समझ और संवेदना का दुर्लभ संयोग है और गहरी जीवनासक्ति कि पेड़, पत्थर, पानी, हवा हमें अपने पूर्वजों की तरह लगने लगते हैं (जो कि वे सचमुच हैं)।…एक अद्भुत आत्मीय संस्पर्श है इस दृष्टि में कि जिन चीज़ों पर वह पड़ती है, वे जीवित हो उठती हैं और अपने अधिकारों की माँग करने लगती हैं। इस तरह संग्रह की सम्पूर्णता में देखा जाए तो यही लगता है कि लाशों से भरे समय का सामना करती ये कविताएँ मृत्यु को न सिर्फ़ मनुष्य की नियति मानने से इनकार करती हैं बल्कि जीने के लिए ज़रूरी सामान भी जुटाती हैं।
—नरेश सक्सेना




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