Description
डॉ. एन. सिंह हिन्दी दलित साहित्य की स्थापना के लिए प्रारम्भ से ही संघर्षरत रहे हैं। चाहे वह दलित रचनाओं का सम्पादन कर उन्हें पाठकों-आलोचकों तक पहुँचाने का काम हो अथवा दलित रचनाकारों की कृतियों पर समीक्षा लिखकर उन्हें चर्च के केन्द्र में लाने का काम हो। दलित साहित्य को पाठ्यक्रम में लगवाने तथा उसकी वैचारिकी को स्पष्ट करने में उनकी भूमिका को सभी दलित लेखकों ने मुक्तकंठ से स्वीकार किया है। उनकी यह कृति ‘दलित साहित्य के प्रतिमान’ हिन्दी दलित साहित्य को सम्पूर्णता में विश्लेषित करती है। एक तरह से यह ‘हिन्दी साहित्य की तीसरी परम्परा’ को स्थापित करने का प्रयास है जिसमें गैर दलित आलोचकों के आक्षेपों के तर्कपूर्ण उत्तर तो हैं ही, हिन्दी दलित साहित्य के इतिहास तथा उसके सौन्दर्यशास्त्र को दलित दृष्टिकोण से रूपायित भी किया है।




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